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अर्जुन असम में एक चाय बागान देखने जाता है। पहाड़ियों पर ऊपर-नीचे हरी-हरी झाड़ियाँ हैं।
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पत्तियाँ तोड़ने वाले लोग पीठ पर टोकरियाँ टाँगकर चलते हैं। वे दो पत्तियाँ और एक कली तोड़ते हैं।
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अर्जुन भी तोड़ने की कोशिश करता है, और पूरी टहनी ही तोड़ लेता है! सब हँसते हैं।
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फ़ैक्टरी में पत्तियों को मोड़ा और सुखाया जाता है। वे गहरे रंग की और मुड़ी-मुड़ी हो जाती हैं।
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दादाजी दूध और थोड़ी अदरक डालकर चाय बनाते हैं। कितनी अच्छी ख़ुशबू है!
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अर्जुन धीरे-धीरे चुस्की लेता है। “अगली बार मैं बस दो पत्तियाँ और एक कली तोड़ूँगा,” अर्जुन कहता है।