बातूनी कछुआ
एक तालाब में कम्बुग्रीव नाम का एक कछुआ रहता था। दो हंस उसके सबसे अच्छे दोस्त थे।
एक बार गर्मियों में बारिश नहीं हुई, और तालाब सूखने लगा। “हमें उड़कर किसी नए तालाब पर जाना होगा,” हंसों ने कहा। “पर तुम हमारे साथ कैसे चलोगे?”
कछुए को एक तरकीब सूझी। “तुम दोनों एक डंडी को अपनी चोंच में पकड़ लो। मैं बीच से उसे मुँह से पकड़ लूँगा, और तुम मुझे उड़ाकर ले चलना!”
“तरकीब तो अच्छी है,” हंस बोले, “पर याद रखना, तुम्हें मुँह बिलकुल नहीं खोलना है — एक बार भी नहीं।” कछुए ने वादा किया।
वे ऊपर, और ऊपर उड़ते गए — खेतों और गाँवों के ऊपर से। नीचे खड़े लोग उँगली उठाकर हँसने लगे। “देखो, देखो! दो पंछी डंडी पर एक कछुए को लटकाए ले जा रहे हैं!”
कछुए का मन किया कि कहे, “तुम अपने काम से काम रखो!” उसने बोलने के लिए मुँह खोला —
— और डंडी छूट गई! वह नीचे गिरता गया, सीधा ज़मीन तक। अच्छा हुआ कि वह भूसे के नरम ढेर पर गिरा, पर उसके दोस्तों को उसके बिना ही आगे उड़ जाना पड़ा।