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अहमदाबाद में पतंग का दिन है! आसमान पतंगों से भरा है। अर्जुन के पास सूरज जैसी पीली पतंग है।
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दूसरी पतंगें झपटती हैं और डोर काटती हैं। अरे! अर्जुन और डोर छोड़ता है। ऊपर, ऊपर, ऊपर!
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सूरज डूब जाता है। एक पतंग अब भी उड़ रही है। “काई पो छे!” अर्जुन चिल्लाता है।
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दादाजी अर्जुन को डोर लपेटना सिखाते हैं। चरखी पर गोल-गोल।
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पड़ोस की एक छोटी लड़की के पास पतंग नहीं है। अर्जुन बाँट लेता है। दो हाथ, एक डोर!
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पीली पतंग अब दीवार पर सोती है। अगले साल, फिर आसमान!